मुखड़ा
झूठा जग का मेला रे भाई,
झूठी सारी शान रे...
साँस की डोरी टूट गई तो,
कौन यहाँ पहचान रे...
झूठा जग का मेला रे भाई,
झूठी सारी शान रे...
माटी का तन माटी होवे,
झूठा सब अभिमान रे...
अंतरा 1
कोठी महल अटारी ऊँची,
सब यहीं रह जाना रे...
सोने चाँदी जोड़न वाला,
खाली हाथ ही जाना रे...
जिसको अपना समझ रहा तू,
दो दिन का मेहमान रे...
साँझ ढले जब पंछी उड़ जाएँ,
सूना रह जाए स्थान रे...
मुखड़ा
झूठा जग का मेला रे भाई,
झूठी सारी शान रे...
साँस की डोरी टूट गई तो,
कौन यहाँ पहचान रे...
अंतरा 2
माया के रंग लाख निराले,
मन को भरमाए रे...
तृष्णा की इस लंबी डोरी,
जन्मों तक बंधवाए रे...
नाम बिना सब सूना सूना,
नाम ही असली धन रे...
जैसे बूंद समंदर मिल जाए,
वैसे मिल जाए मन रे...
साखी (कबीर शैली)
काल खड़ा है द्वार पे तेरे,
काहे करे गुमान रे...
एक दिवस सब छूटे जग से,
राजा हो या रंक रे...
अंतरा 3
जिस दिन आँखें मूँद पड़ेगी,
कौन तेरा होवे रे...
रोते रोते चार जन आएँ,
फिर जग अपना सोवे रे...
जिसको लेकर दौड़ा फिरता,
वो भी यहीं ठिकाना रे...
साथ चले तो नाम प्रभु का,
बाकी सब बेगाना रे...
महा-हुक (उठान)
चल रे मन अब जाग जरा,
छूटत जाए प्राण रे...
साँस साँस में राम बसा ले,
यही सच्ची पहचान रे...
चल रे मन अब जाग जरा,
छूटत जाए प्राण रे...
साँस की डोरी टूट गई तो,
कौन यहाँ पहचान रे...
अंतिम मुखड़ा / आउट्रो
झूठा जग का मेला रे भाई,
झूठी सारी शान रे...
माटी का तन माटी होवे,
झूठा सब अभिमान रे...
साँस की डोरी टूट गई तो,
कौन यहाँ पहचान रे...
कौन यहाँ पहचान रे...
ओ रे भाई...
कौन यहाँ पहचान रे...